डॉलर के बिना 96% कारोबार: 2022 के बाद भारत-रूस ने कैसे खड़ा किया 'रुपया-रूबल व्यापार'?
सोचिए, दो बड़े देश आपस में अरबों डॉलर का कारोबार करें, लेकिन डॉलर का नाम तक न आए। यही आज भारत और रूस के बीच हो रहा है। रूस के एक बड़े बैंकर ने हाल ही में बताया कि दोनों देशों के व्यापार का 96 प्रतिशत हिस्सा अब सीधे रुपये और रूबल में हो रहा है। 2022 में शुरू हुई यह कहानी आज एक मजबूत सिस्टम बन चुकी है। आइए, शुरू से लेकर आज तक, पूरा मामला आसान भाषा में समझते हैं।
क्या कहा है रूस के बैंकर ने?
भारत में स्बेरबैंक के प्रमुख इवान नोसोव ने यह जानकारी दी है। उनके मुताबिक, भारत और रूस के बीच बही-खातों के निपटान में अब कोई समस्या नहीं बची है। रुपया-रूबल व्यापार अब इतना मजबूत हो चुका है कि इसे रूस के सबसे भरोसेमंद भुगतान तंत्रों में गिना जा रहा है।
नोसोव ने साफ कहा कि यह व्यवस्था सिर्फ भारत के लिए नहीं, बल्कि रूस के दूसरे व्यापारिक साझेदारों के लिए भी एक मिसाल बन गई है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिमी देशों के प्रतिबंध रूस पर लगातार बढ़ रहे हैं।
2022 से पहले हालात कैसे थे?
2022 से पहले भारत और रूस के बीच व्यापार में डॉलर का ही बोलबाला था। रुपये या रूबल में सीधा भुगतान लगभग नहीं होता था। रूस से तेल खरीद भी उतनी बड़ी मात्रा में नहीं होती थी, जितनी आज होती है।
फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ। इसके फौरन बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। कई रूसी बैंकों को अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली स्विफ्ट से बाहर कर दिया गया। इससे रूस के लिए डॉलर और यूरो में लेनदेन करना बेहद मुश्किल हो गया।
रुपया-रूबल व्यापार की शुरुआत कैसे हुई?
जुलाई 2022 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक नई व्यवस्था का ऐलान किया। इसके तहत निर्यात और आयात का भुगतान सीधे रुपये में किया जा सकता था। इसे "विशेष रुपया वोस्ट्रो खाता" यानी SRVA कहा गया।
इसी व्यवस्था के तहत रूस के दो सबसे बड़े बैंक, स्बेरबैंक और वीटीबी बैंक, सबसे पहले भारत में यह खाता खोलने वाले विदेशी बैंक बने। इसके बाद यूको बैंक ने गैज़प्रोमबैंक के साथ भी ऐसा ही खाता खोला। नवंबर 2022 तक नौ ऐसे खाते खुल चुके थे।
2023 आते-आते यह आंकड़ा और बढ़ गया। संसद में सरकार ने बताया कि रूस के 34 बैंकों को 14 भारतीय बैंकों में विशेष रुपया वोस्ट्रो खाता खोलने की मंजूरी मिल चुकी थी। यहीं से रुपया-रूबल व्यापार ने असली रफ्तार पकड़ी।
बाद में RBI ने इस प्रक्रिया को और आसान बना दिया। अब विदेशी बैंकों के लिए ऐसा खाता खोलने में हर बार RBI से मंजूरी लेने की जरूरत नहीं रही। इससे रुपया-रूबल व्यापार को बढ़ावा मिलना और आसान हो गया।
कैसे काम करता है रुपया-रूबल व्यापार?
तरीका बेहद आसान है। भारत रूस को भुगतान रुपये में करता है। रूस भारत को भुगतान रूबल में करता है। बीच में डॉलर या यूरो जैसी किसी तीसरी करेंसी की जरूरत नहीं पड़ती।
इस समय 22 रूसी बैंक और 17 भारतीय बैंक इस काम में लगे हैं। आंकड़े दिखाते हैं कि 90 प्रतिशत से ज्यादा लेनदेन 10 मिनट के भीतर पूरे हो जाते हैं। इनमें से आधे से ज्यादा सौदे तो एक मिनट से भी कम समय में निपट जाते हैं।
यही रफ्तार रुपया-रूबल व्यापार को इतना भरोसेमंद बनाती है। पहले जहां भुगतान में हफ्तों लग जाते थे, वहीं अब मिनटों में काम पूरा हो जाता है।
व्यापार के आंकड़े क्या कहते हैं?
पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस भारत को रियायती दरों पर तेल बेचने लगा। भारत ने भी इस मौके का पूरा फायदा उठाया। नतीजा यह हुआ कि 2024 में भारत-रूस का द्विपक्षीय व्यापार 70 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया। यह आंकड़ा 2022 से पहले की तुलना में करीब तीन गुना ज्यादा है।
भारत आज भी रूस से सबसे ज्यादा तेल खरीदने वाले देशों में शामिल है। मई 2026 में भारत ने करीब 6.7 अरब डॉलर मूल्य का रूसी ईंधन खरीदा, जिसमें कच्चा तेल सबसे बड़ा हिस्सा रहा। इस खरीद के चलते भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बना रहा।
2025 में क्यों आई गिरावट?
रुपया-रूबल व्यापार की यह कहानी सीधी लकीर में आगे नहीं बढ़ी। 2025 में अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर प्रतिबंध और सख्त कर दिए। इसका सीधा असर तेल व्यापार पर पड़ा।
जनवरी से अक्टूबर 2025 के बीच भारत का रूसी कच्चे तेल आयात करीब 18 प्रतिशत घटकर 37.1 अरब डॉलर रह गया। इसी दौरान अमेरिका से तेल आयात में 83 प्रतिशत का उछाल आया। दिसंबर 2025 में तो भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी घटकर सिर्फ 27.4 प्रतिशत रह गई, जो जनवरी 2023 के बाद सबसे कम स्तर था।
इस दौरान भारत ने अपने तेल स्रोतों में विविधता लाना शुरू किया। खाड़ी देशों और अमेरिका से आयात बढ़ाया गया। लेकिन यह गिरावट ज्यादा समय तक नहीं टिकी।
2026 में फिर कैसे लौटी रफ्तार?
2026 की पहली छमाही में हालात फिर बदले। भारतीय रिफाइनरियों ने रियायती दरों का फायदा उठाते हुए रूसी तेल की खरीद फिर बढ़ा दी। इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी बड़ी कंपनियों ने रूसी कच्चे तेल के नए सौदे किए।
इसी सुधार के साथ रुपया-रूबल व्यापार ने भी फिर रफ्तार पकड़ी। स्बेरबैंक के प्रमुख इवान नोसोव का ताजा बयान इसी सुधार की तस्वीर दिखाता है। उनके मुताबिक, भुगतान तंत्र अब पहले से कहीं ज्यादा स्थिर और भरोसेमंद हो चुका है।
पहले क्या दिक्कतें आई थीं?
शुरुआत में यह व्यवस्था इतनी आसान नहीं थी। रूसी कंपनियों ने शिकायत की थी कि उनके पास भारतीय रुपये तो जमा हो रहे थे, लेकिन रुपया पूरी तरह परिवर्तनीय करेंसी नहीं है। इस वजह से रूस उस पैसे का इस्तेमाल आसानी से नहीं कर पा रहा था।
दरअसल भारत रूस से जितना तेल खरीदता है, रूस को उतना निर्यात नहीं करता। इससे व्यापार में असंतुलन बना रहा। भारतीय बैंकों में रूस के अरबों रुपये जमा होते रहे, लेकिन उनका पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया। यही वजह थी कि रुपया-रूबल व्यापार को पहले संदेह की नजर से भी देखा गया।
लेकिन नई भुगतान व्यवस्था और बैंकों के बीच बेहतर तालमेल ने इस दिक्कत को काफी हद तक सुलझा दिया है।
भारत-रूस दोस्ती की नई तस्वीर
बीते सोमवार राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात हुई। इस दौरान मोदी ने दोनों देशों के बढ़ते आर्थिक रिश्तों की तारीफ की। यह दिखाता है कि रुपया-रूबल व्यापार अब सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि कूटनीतिक रिश्तों का भी हिस्सा बन चुका है।
(यह भी पढ़ें: भारत रूस मित्रता: पश्चिम की ईर्ष्या, भारत की आवश्यकता)
वैसे भी, दुनिया में जब भी बड़े देशों के बीच तनाव या समझौते होते हैं, उसका असर व्यापार पर सीधा दिखता है। जैसे हाल में हुए घटनाक्रम को ही देख लीजिए।
(यह भी पढ़ें: अमेरिका ईरान युद्धविराम: दोस्ती की असली परीक्षा वाशिंगटन इज़राइल के बीच)
आगे क्या रहेगा असर?
विशेषज्ञ मानते हैं कि रुपया-रूबल व्यापार आगे और मजबूत हो सकता है। पश्चिमी प्रतिबंध जितने सख्त होंगे, दोनों देश स्थानीय करेंसी में व्यापार को उतना ही बढ़ावा देंगे।
फिलहाल यह व्यवस्था मुख्य रूप से तेल व्यापार पर टिकी है। आने वाले समय में इसे रक्षा उपकरण, उर्वरक और दूसरे क्षेत्रों में भी बढ़ाया जा सकता है। भारत और रूस लंबे समय से अपने कुल व्यापार को 25 अरब डॉलर से बढ़ाकर काफी ऊंचे स्तर तक ले जाने का लक्ष्य रखते आए हैं, और मौजूदा 70 अरब डॉलर का आंकड़ा इस दिशा में एक बड़ा कदम है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, 2022 के बाद बदले हालात ने भारत और रूस को एक नया रास्ता दिखाया। शुरुआती दिक्कतों, बीच में आई गिरावट और फिर सुधार के बावजूद, रुपया-रूबल व्यापार आज सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है। आने वाले समय में यह व्यवस्था और गहरी हो सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. रुपया-रूबल व्यापार क्या है?
यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें भारत और रूस बिना डॉलर या यूरो के, सीधे रुपये और रूबल में भुगतान करते हैं।
2. भारत-रूस व्यापार में रुपया-रूबल का हिस्सा कितना है?
मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, दोनों देशों के व्यापार का 96 प्रतिशत हिस्सा अब रुपये और रूबल में हो रहा है।
3. रुपया-रूबल व्यापार व्यवस्था कब और कैसे शुरू हुई?
जुलाई 2022 में RBI ने विशेष रुपया वोस्ट्रो खाता व्यवस्था शुरू की। इसके बाद स्बेरबैंक और वीटीबी जैसे रूसी बैंकों ने भारत में खाते खोले।
4. इसमें कितने बैंक शामिल हैं?
फिलहाल 22 रूसी बैंक और 17 भारतीय बैंक इस भुगतान तंत्र से जुड़े हुए हैं।
5. लेनदेन में कितना समय लगता है?
90 प्रतिशत से ज्यादा लेनदेन 10 मिनट में पूरे हो जाते हैं, जबकि आधे से ज्यादा सौदे एक मिनट से भी कम समय में निपट जाते हैं।
6. 2025 में व्यापार में गिरावट क्यों आई थी?
अमेरिका और यूरोपीय संघ के सख्त प्रतिबंधों के कारण भारत का रूसी तेल आयात घट गया था, जिससे व्यापार में अस्थायी कमी आई।
Research & Analysis by Swati Sharma
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